Wednesday, November 02, 2005

विलाप

विलाप

वह किसी का हाथ
रूमाल में लिपटा,
वह खोया हुआ हाथ
उस हाथ ने कभी छुआ अपने जन्म को
और जाना अपने होने को,
उसने छुआ रोटी के टुकड़े को
प्रेम के स्पर्श को
और लिखा कुछ,
एक गर्म दिन
उसने टटोला हवा की उपस्थिति को
,
बरसते हुए मानूसन को समेटा अंजलि भर
बादलों की गर्जना में हल्की सी सीत्कार समुंदर की
,


उस हाथ ने कभी संभाला गिरते हुए को
खोजा खोए हुए को
टटोला अँधेरे में बत्ती को,
हाथ पकड़ा किसी का सड़क पार करते ।
मैंने तस्वीर में देखा
एक हाथ उठाए है रूमाल में लिपटे एक विक्षत हाथ को
जिसका नहीं कोई चेहरा
नहीं पहचान
कोई नाम,
आतंक से उपजे शोक में
कोई विलाप नहीं
शब्दों में मृतकों के लिए





© मोहन राणा 2.11.05

रेत का पुल/ RET KA PUL

Mohan Rana's poetry is always tuned to sounds from near and afar. At the same time it captures in its images the essence of close and ...