Friday, December 16, 2005

एक कविता फिर से

आज सुबह कागजों को उलटते पुलटते यह कविता मिल गई.
झपकी

नंगे पेड़ों पर
उधड़ी हुई दीवारों पर
बेघर मकानों पर
खोए हुए रास्तों पर
भूखे मैदानों पर
बिसरी हुई स्मृतियों पर
बेचैन खिड़कियों पर
छुपी हुई छायाओं में बीतती दोपहर पर,
हल्का सा स्पर्श
ढांप लेता हूँ उसे हथेलियों से,
उठता है मंद होते संसार का स्वर
आँख खुलते ही


3.2.05 © मोहन राणा

Saturday, December 10, 2005

आलू बुखारा

बगीचे में आलु बुखारे का पेड़ कल लगाया, पता नहीं वह ठंड को झेल पाएगा, उसमें जड़ें ही नहीं थी!!
पत्ते तो थे ही नहीं...बच गया तो कभी उसमें जामुनी रंग के फल आएँगे.

Sunday, December 04, 2005

भंवर


अंगूर की बेलों में लिपट
सो जाती धूप बीच दोपहर
गहरी छायाओं में
सोए हैं राक्षस
सोए हैं योद्धा
सोए हैं नायक
सोया है पुरा समय खुर्राता
अपने आप को दुहराते अभिशप्त वर्तमान में.

4.12.05 © मोहन राणा

Friday, December 02, 2005

चश्मा


कभी कभी लगाता हूँ
पर खुदको नहीं
औरों को देखने के लिए लगाता हूँ चश्मा,
कि देखूँ मैं कैसा लगता हूँ उनकी आँखों में
उनकी चुप्पी में,
कि याद आ जाए तो उन्हें आत्मलीन क्षणों में मेरी भी
आइने में अपने को को देखते,
मुस्कराहट के छोर पर.

2.12.05 © मोहन राणा

रेत का पुल/ RET KA PUL

Mohan Rana's poetry is always tuned to sounds from near and afar. At the same time it captures in its images the essence of close and ...