Sunday, December 04, 2005

भंवर


अंगूर की बेलों में लिपट
सो जाती धूप बीच दोपहर
गहरी छायाओं में
सोए हैं राक्षस
सोए हैं योद्धा
सोए हैं नायक
सोया है पुरा समय खुर्राता
अपने आप को दुहराते अभिशप्त वर्तमान में.

4.12.05 © मोहन राणा

2 comments:

Pratik said...

मोहन जी, बहुत ही उत्तम कविताएँ हैं। आपसे एक अनुरोध है कि कृपया अपने ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी करने की सुविधा को चालू कर लीजिए। जिससे कि लोग आपकी कविताओं पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकें।

अनूप भार्गव said...

सुन्दर कविता है ..

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Mohan Rana's poetry is always tuned to sounds from near and afar. At the same time it captures in its images the essence of close and ...