Monday, April 16, 2007

अंकुर


अभी सब एक जैसे लगते हैं नन्हे् अंकुर, पर कुछ दिन में सब के अपने अलग रंग हो जाएँगे , बनेंगे आकार और होगा अपना ही स्वाद... एक ही ट्रे में पालक भी है और इमली का भी अंकुर!

शुरू शुरू में सब एक साथ...
होता है ना ऐसा ही !
सुना किसी को कहते और छुपते

2 comments:

ALOK PURANIK said...

मोहनजी अंकुर देख-पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ।
आप बिलकुल वही हैं। अपनी उसी संवेदनशीलता को बचाये हुए। बहुत मुश्किल है इस दौर में। मैं तो उस विधा का राइटर हूं, जिसे लगभग डंडेबाजी कहा जा सकता है-व्यंग्य़ आपको वैसा की वैसा देखना सुखद है। कवि जो नहीं बदलता दुनिया के साथ, दुनिया को बदलने की उम्मीद उससे ही की जा सकती है।
आलोक पुराणिक

Anonymous said...

mohan ji please mughe bhi apne blog me samil kar de to badi kirpa hoogi mera blog hai http://veerurawat.blogspot.com

The Cartographer

The Cartographer Between the lines it’s you, absent, but a silent presence just as the rain is absent in the passing clouds. Th...