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Showing posts from 2010

अपनी ऊँचाई समतल

Are we living in the end times?

यथार्थ की ओर

खिड़की

कुछ पत्थर

देखना जो दिखता नहीं

दो पहरों के बीच

पुराने दिल्ली के स्टेशन बाहर

पूर्वपीठिका

दोपहर के बीच गुमनाम दिन

कविता के लिए कोई नया शब्द नहीं

दीवार

सुबह 20 जुलाई 2010

रस्साकशी

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मेरे पाँवों पर उगी है दूब

एक समय

पानी का चेहरा

इस बरस

Translation

शोक सभा में

कालापानी नीली लहरें

खग्रास

बावली धुन

कविता ही फिलहाल

चाँदनी रात में खामोशी

खोए बच्चों के नाम

सैमसंग द्वारा प्रायोजित

बात कुछ ऐसी कि

बरफ गिरती रही रातभर

और मैंने एक दिन में हाँ बोल के

नववर्ष 2010