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Showing posts from August, 2010

देखना जो दिखता नहीं

दो पहरों के बीच

पुराने दिल्ली के स्टेशन बाहर

पूर्वपीठिका

दोपहर के बीच गुमनाम दिन

कविता के लिए कोई नया शब्द नहीं

दीवार