Tuesday, October 24, 2017

This Place is Enough






This Place is Enough

Between two addresses, an undiscovered geography—
I wrote it, kept it aside, and bothering not to read
A face at first, then a second, and a third…
A story that was yours and mine remained an unfinished business
Like a corpus of drying clothes tossing in the wind
Like always, ripe with a miscellany of the unconsummated—
In those pages, I tuck another day,
Turning them and then I walk away

Winter! A muffler around my neck
I turn back to inspect something, groping for my pocket
Feeling like a stranger to myself,
I disappear from the street into an alley
From the visible self, past the threshold of the door
Household, to courtyard, to solitude

In the guise of hope fear follows at each step
My shadow, like a receipt for arrivals and departures
So I have stopped
Here and there, between shadows, measuring my height
And then running with shackled feet, until
This place that is enough to stand, hide
And lie in silence
Or turn into the green doob grass.

Translation from Hindi by Arup K Chatterjee and Amrita Ajay.






यह जगह काफ़ी है

दो पतों के बीच लापता भूगोल में
लिख बंद कर दिया पढ़ना मैंने चेहरा एक नाम दूसरा फिर तीसरा,
मेरी तुम्हारी कहानी रह गई किसी बात पर
सूखते कपड़ों सी उलट अपनी देह को टटोलती हवा में
हमेशा की तरह इस बार भी शेष अनेक
उन पन्नों में एक आज फिर
उलटता रखता
उठ कर चल देता

सर्द मौसम मफ़लर गले में झूलता
मुड़ के कुछ देखते जेब टटोलते
कि पहचाना नहीं जाता हूँ ख़ुद ही
सड़क से एक गली में हवा होते
सरे आम से दरवाज़े पार कहीं,
घर बार, आंगन एकांत में

उम्मीद की शक्ल में डर हर क़दम निहित
मेरे साथ है किसी पर्ची पर लिखे आगमन और प्रस्थान की तरह,
तो अब बंद कर दिया      
यहाँ वहाँ छायाओं में कद नाप अपने पाँवों को बाँध कर भागना,
यह जगह काफ़ी है खड़े होने छुपने
और लेट कर चुपचाप
हरी दूब हो जाने के लिए


2010 

[शेष अनेक {2016} ]
प्रकाशक - कॉपर कॉयन

Sunday, October 22, 2017

मिट्टी का पुतला

मेरे पीछे लगा समय
दिखता दूर कि लगता धीमा पड़ रहा है
पर नज़दीक भाग रहा है  घड़ी के डायल में
और मेरे दिन की छायाएँ छुप रही हैं
जिनमें  मैं फिसलता अपनी
इच्छाओं से बोझिल
मैं लिखता अपनी
सुनता अपनी 
जहाँ औरों के आकाश हैं और पराये स्वदेश
ख़ुद ही बिसरी स्मृतियों के  इन सीमान्तों पर
इतना उजला है आईना यहाँ
कि चटख दोपहर अदृश्य है
नहीं पहचान पाता मैं प्रतिबिम्ब अपने हाथों में
दम साधे एक अँधेरे को खुली आँखों में  छुपाये
- मोहन राणा
© 2017

रेत का पुल/ RET KA PUL

Mohan Rana's poetry is always tuned to sounds from near and afar. At the same time it captures in its images the essence of close and ...